About parshuram in hindi. भगवान Parshuram Ji Kaun The और क्या है उनका इतिहास? 2022-10-25

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परशुराम एक प्रख्यात हिन्दू धर्म के अध्यक्ष हैं। उनका जन्म संत शंकराचार्य और माता हनुमानी के संतान था। वे एक बहुत ही महान अभिषेकी हुए थे और धर्मगुरु बने थे। परशुराम अपने जीवन काफी अधिकांश समय अपने जाति और धर्म की रक्षा करने में लगे हुए थे।

उनके जीवन में कई कार्य हैं जो उनके नाम को सुनामी बना देने वाले हैं। एक ऐसा कार्य है जो परशुराम ने अपने जीवन में किया था, वह है कि वे अपने जाति के पुत्रों को हत्या कर के अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा की है। परशुराम ने अपने जीवन में अपनी जाति की सम्पूर्ण स्त्रियो

भगवान Parshuram Ji Kaun The और क्या है उनका इतिहास?

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Created and Produced by Dilip Sonkar and Kumar Ranjit Under the Banner of Kamalashree Films Private Limited. एक बार भगवान परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि के कहने पर अपनी माँ रेणुका का मस्तक काटकर धड़ से अलग कर दिया Parshuram Ne Apni Mata Ka Sir Kyon Kata था। अपने पुत्र की कर्तव्य निष्ठा से प्रसन्न होकर उनके पिता ने उनसे वरदान मांगने को कहा था। परशुराम जी ने वरदान स्वरुप अपनी माता का जीवन पुनः मांग लिया था। इसके बाद उनकी माँ जीवंत हो उठी थी। 3. राम लक्ष्मण परशुराम संवाद रामचरित मानस से लिया गया है। जो कि सीता जी के स्वयंवर के समय का है। श्री राम, शिव जी का धनुष उठाकर उसे तोड़ देते हैं, तो सारे संसार में इस बात की चर्चा आग की तरह फैल जाती है। जब यह बात परशुराम जी के कानों तक जाती है और उन्हें पता चलता है कि उनके गुरुदेव शिव जी का धनुष किसी ने तोड़ दिया है, वो अपने आपे से बाहर हो जाते हैं। वो धनुष तोडने वाले व्यक्ति का वध करने के लिए सीता जी के स्वयंवर वाली सभा में आ जाते हैं। उसके बाद राम — लक्ष्मण — परशुराम जी के बीच जो बात होती है, उसका वर्णन यहाँ दिया हुआ है। 3. परशुराम जी जन्म और कुल से ब्राह्मण थे, परंतु वे अन्य ब्राह्मणों से अलग थे। उनके पास क्षत्रियों वाले भी सारे गुण थे, जैसे युद्धकौशल, वीरता, शौर्य, पराक्रम, आदि। इसीलिए उन्हें ब्रम्ह-क्षत्रिय माना जाता है । Question 4: परशुराम जयंती कब मनाई जाती है? शिवजी के धनुष को तोड़ने की शक्ति तो केवल आपके दास में ही हो सकती है। इसलिए वह आपका कोई दास ही होगा, जिसने इस धनुष को तोडा है। क्या आज्ञा है? वे तुरंत मन की गति से मिथिला राजा जनक के दरबार में पहुंच गये और राम को चेतावनी दी. परशुराम जी का जन्म वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ था। इसीलिए प्रतिवर्ष इसी दिन इनका जन्मोत्सव या जयंती मनाई जाती है। इस दिन को अक्षय तृतीया भी बोल जाता है। ऐसा और ज्ञान पाना चाहते हैं? प्राचीन इतिहास एवं पुराणों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि संसार में सात ऐसे महापुरुष है जो चिंरजीवी है तथा सभी दिव्य शक्तियों से सम्पन्न है उनमें परशुराम भी एक हैं तथा आज भी वे महेंद्र पर्वत पर विद्यमान हैं.

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Bhagwan Parshurama Jayanti In Hindi

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जो तुम इनकी तुलना आपस में कर रहे हो? रामावतार के समय उनकी भगवान श्रीराम से राजा जनक के दरबार में प्रथम बार भेंट हुई थी। तब उन्हें यह ज्ञान नही था कि श्रीराम विष्णु के रूप हैं, इसलिए वे उन पर शिव धनुष तोड़ने के लिए क्रोध करने लगे Parshuram Ram Lakshman Samvad थे। भरी सभा में भगवान परशुराम और श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण के बीच तीखा संवाद भी हुआ था। इसके बाद श्रीराम ने परशुराम को अपने विष्णु अवतार के रूप में दर्शन दिए थे। यह देखकर परशुराम का क्रोध शांत हो गया था और वे वहां से चले गए थे। 6. तथा उनसे बात करने में भी पारंगत थे. भगवान परशुराम जी की कथाएं — parshuram story in hindi pdf download परशुराम जी की अनेक कथाएं प्रचलित है. महाभारत काल में गंगा पुत्र भीष्म ने जब काशीराज की पुत्री अम्बा का अपहरण कर लिया था तो उसके सम्मान की रक्षा के लिए उन्होंने भीष्म से भी युद्ध किया तथा पुरुषों के लिए एक पत्नी धर्म का संदेश दिया. परशुराम शस्त्र विद्या में पारंगत आचार्य थे.

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भगवान परशुराम के बारे में 10 रोचक तथ्य, Parshuram Unknown Facts In Hindi

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वे अपने माता पिता की पाँचवी संतान थे उन्हें विष्णु के छठे अवतार आवेशा वतार के रूप में जाना जाता हैं. एक बार राजा सहस्त्रार्जुन वन में आखेट करता हुआ अपनी सेना के साथ ऋषि जमदग्नि के आश्रम पहुंचा. परशुराम परम गौ भक्त भी थे. Parshuram की माता रेणुका भी अपने पति के साथ सती हो गई. Parshuram Ke Guru Kaun The क्या आप जानते हैं भगवान परशुराम जी के गुरु कौन थे? लखन कहा हसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥ का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें।। छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥ राम लक्ष्मण परशुराम संवाद भावार्थ :- परशुराम की बात सुनने के उपरांत लक्ष्मण मुस्कुराते हुए व्यंगपूर्वक उनसे कहते हैं कि, हमें तो सारे धनुष एक जैसे ही दिखाई देते हैं, किसी में कोई फर्क नजर नहीं आता। फिर इस पुराने धनुष के टूट जाने पर ऐसी क्या आफ़त आ गई है? भगवान श्रीकृष्ण के समय में भी उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। महाभारत का युद्ध लड़ने वाले तीन महान योद्धा उनके शिष्य Parshuram Role In Mahabharata In Hindi थे। उन्होंने भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य तथा दानवीर कर्ण को अस्त्र-शस्त्र की विद्या में पारंगत किया था। बाद में इन तीनों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 7. निबंध, भाषण, अनुच्छेद में हम भगवान परशुराम जयंती, इतिहास, जीवनी, कथा, जीवन परिचय के बारें में विस्तार से जानेगे, आप इसे पढ़ने के बाद जान पाएगे कि परशु राम कौन थे उनकी प्रतिज्ञा व कार्य क्या थे आदि. उनकी प्रतिभा और दैवीय गुणों से प्रभावित होकर ऋषि कष्यप ने उन्हें अविनाशी वैष्णव मंत्र प्रदान किया.

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Parshuram (TV Series 2022

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हुआ यूं कि जब भगवान राम ने सीता स्वयंवर के दौरान शिव धनुष भंग कर दिया तो Bhagwan Parshuram को यह समाचार मिला. परशुराम दानवीर भी थे. भगवान शिव से इन्हें परशु अर्थात फरसा हथियार वरदान में मिला था इस कारण इनका नाम भी परशुराम भी पड़ गया. कुपित Parshuram ने हैहयवंशीय राजा के महिष्मति नगर पर आक्रमण कर सभी क्षत्रियों का विनाश कर दिया. Essay On Parshuram In Hindi: नमस्कार दोस्तों आज हम भगवान महर्षि परशुराम पर निबंध लेकर आए हैं. इनका प्रातः स्मरण करने से मनुष्य दीर्घायु तथा निरोग रहता हैं.

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Biography of Parshuram in Hindi

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इसके अलावा द्रोण और कर्ण भी उनके शिष्य थे. एक कथा भीष्म के साथ उनके युद्ध की है. . भगवान परशुराम के जन्म से जुड़ी अद्भुत कहानी— Parshuram Jayanti story भगवान परशुराम के जन्म से जुड़ी कहानी बहुत ही अद्भुत हैं। कहते हैं की अति प्राचीन समय में गाधि नाम के राजा का कन्नोज के ऊपर शासन था। उनकी पुत्री का नाम सत्यवती थी। राज गाधि ने अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह महर्षि भृगु के पुत्र ऋचीक के साथ किया था। एक समय की बात है सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त किया। तब पुत्र महर्षि भृगु ने उन्हें दो फल दिए, एक फल सत्यवती के लिए और दूसरा सत्यवती के माँ के लिए। उन्होंने कहा की उन्हें और उनकी माता को पुत्र की कामना करते हुए पीपल और गूलर के वृक्ष से गले मिलकर इस फल का सेवन करना है। लेकिन सत्यवती ने पेड़ के आलिंगन के बाद गलती से अपनी माँ का फल का सेवन कर लिया। जब सत्यवती को इस बात का अहसास हुआ तब उसने इसके बारें में महर्षि भृगु को बताई। महर्षि भृगु ने सत्यवती से कहा कि अब तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण तो होगा लेकिन वह ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय गुणों वाला पैदा होगा। तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की और बोली की मेरा पुत्र ब्राह्मण गुणों वाला ही हो, भले ही पौत्र क्षत्रिय गुणों वाला उत्पन्न हो जाय जाये। कुछ महीने बाद सत्यवती के गर्भ से महर्षि जमदग्नि का जन्म हुआ। इसी जमदग्नि के घर में वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष तृतीया को पुत्र के रूप में भगवान परशुराम का जन्म हुआ। भगवान विष्णु के 10 अवतारों में से छठा अवतार भगवान परशुराम को माना जाता है। इन्होंने कई वार क्षत्रियों का विनाश किया था। 2. उनके पिता का नाम जमदग्नि तथा माता का नाम रेणुका था. कौरव कुलगुरु आचार्य द्रोण पितामह भीष्म तथा अंगराज कर्ण उनके प्रमुख शिष्य थे.

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परशुराम कुंड का इतिहास

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उनका जीवन एक आदर्श पुरूष का जीवन था. उन्होंने ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपमुद्रा के साथ नारी जागृति हेतु प्रयास किया. यह भी पढ़ें फिर: महाराणा प्रताप कौन थे और क्या है महाराणा प्रताप का इतिहास? एक मान्यता के अनुसार भारत के ज्यादातर गांव परशुराम जी ने ही बसाए थे. इस बात का पता जब Bhagwan Parshuram को चला तो उन्होंने सहस्त्रार्जुन को युद्ध के लिए ललकारा और उसकी सभी भुजाओं को अपनी फरसे से काट डाला और उसका वध कर दिया. अपने क्रोध को शांत करने के लिए उन्होंने इस पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय विहिन कर दिया. अतः उनका प्रकृति एवं पशु पक्षियों के साथ जीवंत सम्बन्ध था. परशुराम जी के अस्त्र परशुराम जी युद्धकला में निपुण थे। उनका मुख्य अस्त्र कुल्हाड़ी माना जाता है, जो उन्हें शिवजी की कठिन तपस्या करके प्राप्त हुआ था। उनके कुल्हाड़ी अस्त्र को परशु या फिर फरसा नाम से भी पुकारते हैं। उनके धनुष कमान का नाम विजय था। ऐसी मान्यता है कि पृथ्वी पर रावण पुत्र इंद्रजीत के अलावा पृथ्वी पर सिर्फ परशुराम जी के पास सबसे शक्तिशाली और अद्वितीय अस्त्र पशुपत, वैष्णव, और ब्रह्मांड अस्त्र थे। शिवजी ने उन्हें कठिन युद्धकला कलारीपयाट्टू की शिक्षा प्रदान भी की थी। परशुराम रामायण Parshuram Ramayan समझते हैं रामायण में परशुराम कौन थे parshuram ji kaun the ; रामायण काल के दौरान परशुराम जी की भूमिका का पता इस कथा से लगता है: जब राम भगवान ने सीता जी के स्वयंवर में पहुँच कर भगवान शंकर का धनुष तोड़ा था, तो उसकी गर्जना सुन परशुराम जी वहाँ पहुँच गए। उन्होंने अत्यंत क्रोधित होकर श्री राम को चुनौती दे दी और लक्ष्मण जी के साथ बहुत बहस की। परन्तु जब उन्हें एहसास हुआ कि श्री राम और कोई नहीं बल्कि भगवान विष्णु का अवतार हैं, तो उन्होंने स्वयं ही समर्पण कर दिया। उसके पश्चात् वे पुनः महेन्द्रगिरि पर्वत में जाकर तपस्या करने लगे। परशुराम कौन थे parshuram ji kaun the में आगे पढ़ें.

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The legend of Parshu

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परशुराम सदा अपने से बड़ो व माता पिता का सम्मान करते थे तथा उनकी आज्ञा का पालन करते थे. And Directed by Gautam Nagrath. भगवान राम ने क्षमा याचना और अपने मीठे शब्दों से उनका क्रोध शांत किया. सीता स्वयंवर में लक्ष्मण से संवाद जब भगवान परशुराम को सीता स्वयंवर में शिव धनुष का टूटने का पता चला तो वे जनकपुर गये। वहाँ लक्षमन को उनके क्रोध का सामना करना पड़ा। राम से मिलने के बाद उन्हें उनका तेज प्रभु श्री राम में समा गया। वे समझ गये की विष्णु अवतार हो चुका है और वापस तपस्या करने चले गये। 9. जब कर्ण को उन्होंने अपना शिष्य बनाया और कर्ण की वास्तविकता जानने के बाद उसे श्राप दिया कि जब उसे उनकी शिक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत होगी तभी वह इस शिक्षा को भूल जाएगा. लगता है, तुझे मेरे व्यक्तित्व के बारे में नहीं पता। मैं अभी तक बालक समझकर तुझे क्षमा कर रहा था। परन्तु तू मुझे एक साधारण मुनी समझ बैठा है। मैं बचपन से ही ब्रह्मचारी हूँ। सारा संसार मेरे क्रोध को अच्छी तरह से पहचानता है। मैं क्षत्रियों का सबसे बड़ा शत्रु हूँ। अपने बाजुओं के बल पर मैंने कई बार इस पृथ्वी से क्षत्रियों का सर्वनाश किया है और इस पृथ्वी को जीतकर ब्राह्मणों को दान में दिया है। इसलिए हे राजकुमार लक्ष्मण! इस दिन को भगवान परशुराम की जयंती के रूप में भारत भर में मनाया जाता हैं. पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि श्रीराम जी ने परशुरामजी को द्वापर युग तक सुदर्शन चक्र की हिफाजत का जिम्मा दिया था.

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राम लक्ष्मण परशुराम संवाद अर्थ सहित

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Bhagwan Parshuram और कल्कि अवतार हिंदू पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान परशुराम जी कलियुग में अवतार लेने वाले कल्कि अवतार के भी गुरू बनेंगे और भगवान विष्णु के दसवें अवतार को युद्ध कौशल की शिक्षा देंगे. हर वर्ग उनको पूजनीय मानता है. Parshuram जी का जन्म वैशाख शुक्ल की तृतीया को हुआ. उनका नाम परशुराम कैसे पड़ा वे भगवान शिव के परमभक्त थे। बालक राम अपने पिता के कहने पर शस्त्र विद्या सीखने हिमालय पर्वत पर चले गये। वहाँ उन्होंने भगवान शिव के कठोर आराधना की। भगवान शिव उनके आराधना से अति प्रसन्न हुए। उस दौरन देवता लोग दानवों से अत्यंत ही परेशान थे। भगवान सदा शिव ने राम को अपना दिव्य अस्त्र परशु दिया। भगवान शिव ने दिव्य अस्त्र परशु उन्हें प्रदान कर, दानवों से देवताओं की रक्षा करने को कहा। अपने गुरु शिव जी की आज्ञा से उन्होंने असुरों से देवताओं की रक्षा की। स प्रकार भगवान शिव के अमोध अस्त्र पाने के कारण ही उनका नाम राम से परशुराम हो गया। 3. परशुराम अपने व्यवहार से कई हिंसक वन्य प्राणियों को भी अपना मित्र बना लेते थे.

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परशुराम पर निबंध

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. तुलसीदास जी ने इस भेंट का बहुत सुंदर वर्णन किया है. पुराणों की मान्यता के अनुसार ये भगवान विष्णु के छठवें अवतार थे और इनकी मृत्यु कभी नहीं हुई थी, बताया जाता है कि ये आज भी जिन्दा हैं. इस कथा के अनुसार हैहय वंश के राजा सहस्त्रार्जुन या कार्तवीयअर्जुन ने घोर तपस्या की और भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर लिया. नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥ आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥ सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरिकरनी करि करिअ लराई॥ सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥ सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥ सुनि मुनिबचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अवमाने॥ बहु धनुही तोरी लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस किन्हि गोसाईँ॥ येही धनु पर ममता केहि हेतू। सुनी रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥ रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार्। धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार॥ लखन कहा हसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥ का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें।। छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥ बोले चितै परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा॥ बालकु बोलि बधौं नहि तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।। बाल ब्रह्म्चारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही॥ भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥ सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥ मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर। गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर॥ बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी।। पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारु। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥ इहाँ कुम्हड़बतिया कोऊ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥ देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥ भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहौं रिस रोकी॥ सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई॥ बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहू पा परिअ तुम्हारें।। कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा॥ जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर। सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गंभीर। कौसिक सुनहु मंद येहु बालकु। कुटिलु कालबस निज कुल घालकु॥ भानुबंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुसु अबुधु असंकू॥ कालकवलु होइहि छन माहीं। कहौं पुकारि खोरि मोहि नाहीं॥ तुम्ह हटकहु जौ चाहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा॥ लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा॥ अपने मुहु तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी॥ नहि संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू॥ बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा॥ सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। विधमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥ तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥ सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥ अब जनि दै दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू॥ बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब येहु मरनिहार भा साँचा॥ कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥ खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगे अपराधी गुरुद्रोही॥ उतर देत छोड़ौं बिनु मारे। केवल कौसिक सील तुम्हारे॥ न त येहि काटि कुठार कठोरे। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरे॥ गाधिसूनु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ। अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ॥ कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा॥ माता पितहि उरिन भये नीकें। गुररिनु रहा सोचु बड़ जी कें॥ सो जनु हमरेहि माथें काढ़ा। दिन चलि गये ब्याज बड़ बाढ़ा॥ अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली॥ सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा॥ भृगुबर परसु देखाबहु मोही। बिप्र बिचारि बचौं नृपद्रोही॥ मिले न कबहूँ सुभट रन गाढ़े। द्विजदेवता घरहि के बाढ़े॥ अनुचित कहि सबु लोगु पुकारे। रघुपति सयनहि लखनु नेवारे॥ लखन उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु। बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु॥ 4. महाभारत की दूसरी प्रमुख कथा कर्ण की है. भगवान परशुराम ने जब कर्ण को श्राप दिया अंगराज कर्ण परशुराम के पास शस्त्र विद्या प्राप्त कर रहे थे। उन्होंने अपने को सूत पुत्र के रूप में परिचय दिया था। एक समय की बात है परशुराम, कर्ण के जांघ पर सर रखकर सो रहे थे। इस दौरान कर्ण को किसी कीड़े ने काट लिया और पैर से खून निकल रहा था। लेकिन कर्ण कष्ट सहते रहे और अपने पैर को नहीं हिलाया। क्योंकि इससे परशुराम जी की नींद खुल जाती। जब परशुराम जी नींद से जगे, तो कर्ण के बहते हुए खून को देखकर वे समझ गये। उन्हें पता चल गया की कर्ण कोई सूत पुत्र नहीं है बल्कि क्षत्रिय है। इस करना उन्होंने कर्ण को श्राप दे दिया की जो विद्या कर्ण ने सीखी है। वह जरूरत पड़ने पर भूल जाएगा। कहते हैं की महाभारत की लड़ाई में परशुराम जी के श्राप के कारण उनसे सीखी विद्या को भूल गये। जो उनकी मृत्यु का कारण बना। 7.

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